ऐसा लग रहा जैसे दुनिया में होना निरर्थक है।अपनी आंखों के सामने सब खराब होते देखकर भी कुछ न कर पाना कितना तकलीफदेह होता है।बस जान नहीं निकलती बाकी इस दर्द को किस शब्द में व्यक्त किया जा सकता है

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