ऐसा लग रहा जैसे दुनिया में होना निरर्थक है।अपनी आंखों के सामने सब खराब होते देखकर भी कुछ न कर पाना कितना तकलीफदेह होता है।बस जान नहीं निकलती बाकी इस दर्द को किस शब्द में व्यक्त किया जा सकता है
आज मुझे पता चला कि कैसे कोई वो हो जाता है जो होने से उसे नफरत होती है।परिस्थिति कैसे उसे पूरी तरह बदल देती है।उसकी भाषा, उसका व्यवहार,प्रेम,संवेदना सब खत्म हो जाता है।
इन दिनों जितनी हताशा और निराशा है शायद कभी नहीं थी।ऐसा महसूस हो रहा कि जीवन के हर जंग में हार ही मिली। ऐसा लगता है कि मेरे पास अब किसी को देने के लिए कड़वाहट,खीझ,गुस्सा, नफ़रत और शिकायतों के सिवा कुछ भी नहीं बचा हो।
कितने पल ऐसे होते हैं जिसमें हम तिनके पर अटके हुए ओस की एक बूँद की तरह ख़ुद को महसूस करते हैं कि अपनापन की एक छुअन से टूट कर उन हथेलियों में ज़ज्ब हो जाएं
अविश्वास में जीना, नर्क जीने के जैसा ही होता है इतना ही तकलीफदेह और दर्द भरा।प्रत्येक क्षण व्यंग्य बाण से मन को छलनी किया जाता है और हम लाख कोशिशों के बाद भी उस विश्वास को नहीं पाते।