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कितने पल ऐसे होते हैं जिसमें हम  तिनके पर अटके हुए ओस की एक बूँद की तरह ख़ुद को महसूस करते हैं कि अपनापन की एक छुअन से टूट कर उन हथेलियों में ज़ज्ब हो जाएं