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अविश्वास में जीना, नर्क जीने के जैसा ही होता है इतना ही तकलीफदेह और दर्द भरा।प्रत्येक क्षण व्यंग्य बाण से मन को छलनी किया जाता है और हम लाख कोशिशों के बाद भी उस विश्वास को नहीं पाते।